श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यः पञ्चभूतरचिते रहितः शरीरे-

च्छन्‍नो यथेन्द्रियगुणार्थचिदात्मकोऽहम्।

तेनाविकुण्ठमहिमानमृषिं तमेनं

वन्दे परं प्रकृतिपूरुषयोः पुमांसम्॥ १४

yaḥ pañcabhūtaracite rahitaḥ śarīre-

cchanno yathendriyaguṇārthacidātmako'ham|

tenāvikuṇṭhamahimānamṛṣiṃ tamenaṃ

vande paraṃ prakṛtipūruṣayoḥ pumāṃsam|| 14

अर्थ

मैं वस्तुतः शरीरादिसे रहित (असंग) होनेपर भी देखनेमें पांचभौतिक शरीरसे सम्बद्ध हूँ और इसीलिये इन्द्रिय, गुण, शब्दादि विषय और चिदाभास (अहंकार)-रूप जान पड़ता हूँ। अतः इस शरीरादिके आवरणसे जिनकी महिमा कुण्ठित नहीं हुई है, उन प्रकृति और पुरुषके नियन्ता सर्वज्ञ (विद्याशक्तिसम्पन्‍न) परमपुरुषकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १४॥✎ 342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #342 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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