एक बार अपनी पुत्री सरस्वतीको देखकर ब्रह्माजी भी उसके रूप-लावण्यसे मोहित हो गये थे और उसके मृगीरूप होकर भागनेपर उसके पीछे निर्लज्जतापूर्वक मृगरूप होकर दौड़ने लगे॥ ३६॥
प्रजापतिः स्वां दुहितरं दृष्ट्वा तद्रूपधर्षितः।
रोहिद्भूतां सोऽन्वधावदृक्षरूपी हतत्रपः॥ ३६
एक बार अपनी पुत्री सरस्वतीको देखकर ब्रह्माजी भी उसके रूप-लावण्यसे मोहित हो गये थे और उसके मृगीरूप होकर भागनेपर उसके पीछे निर्लज्जतापूर्वक मृगरूप होकर दौड़ने लगे॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 393) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/36/