वह जीव माताके गर्भाशयमें झिल्लीसे लिपटा और आँतोंसे घिरा रहता है। उसका सिर पेटकी ओर तथा पीठ और गर्दन कुण्डलाकार मुड़े रहते हैं॥ ८॥
उल्बेन संवृतस्तस्मिन्नन्त्रैश्च बहिरावृतः।
आस्ते कृत्वा शिरः कुक्षौ भुग्नपृष्ठशिरोधरः॥ ८
वह जीव माताके गर्भाशयमें झिल्लीसे लिपटा और आँतोंसे घिरा रहता है। उसका सिर पेटकी ओर तथा पीठ और गर्दन कुण्डलाकार मुड़े रहते हैं॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 389) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/8/