श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.8

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

उल्बेन संवृतस्तस्मिन्‍नन्त्रैश्‍च बहिरावृतः।

आस्ते कृत्वा शिरः कुक्षौ भुग्नपृष्ठशिरोधरः॥ ८

ulbena saṃvṛtastasminnantraiśca bahirāvṛtaḥ|

āste kṛtvā śiraḥ kukṣau bhugnapṛṣṭhaśirodharaḥ|| 8

अर्थ

वह जीव माताके गर्भाशयमें झिल्लीसे लिपटा और आँतोंसे घिरा रहता है। उसका सिर पेटकी ओर तथा पीठ और गर्दन कुण्डलाकार मुड़े रहते हैं॥ ८॥

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