श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

अकल्पः स्वाङ्गचेष्टायां शकुन्त इव पञ्जरे।

तत्र लब्धस्मृतिर्दैवात्कर्म जन्मशतोद्भवम्।

स्मरन्दीर्घमनुच्छ्वासं शर्म १ किं नाम विन्दते॥ ९

akalpaḥ svāṅgaceṣṭāyāṃ śakunta iva pañjare|

tatra labdhasmṛtirdaivātkarma janmaśatodbhavam|

smarandīrghamanucchvāsaṃ śarma kiṃ nāma vindate|| 9

अर्थ

वह पिंजड़ेमें बंद पक्षीके समान पराधीन एवं अंगोंको हिलाने-डुलानेमें भी असमर्थ रहता है। इसी समय अदृष्टकी प्रेरणासे उसे स्मरणशक्ति प्राप्त होती है। तब अपने सैकड़ों जन्मोंके कर्म याद आ जाते हैं और वह बेचैन हो जाता है तथा उसका दम घुटने लगता है। ऐसी अवस्थामें उसे क्या शान्ति मिल सकती है?॥ ९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सङ्गात् किं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 389)

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