श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः।

कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः॥ १६

ye tvihāsaktamanasaḥ karmasu śraddhayānvitāḥ|

kurvantyapratiṣiddhāni nityānyapi ca kṛtsnaśaḥ|| 16

अर्थ

जिनका चित्त इस लोकमें आसक्त है और जो कर्मोंमें श्रद्धा रखते हैं, वे वेदमें कहे हुए काम्य और नित्य कर्मोंका सांगोपांग अनुष्ठान करनेमें ही लगे रहते हैं॥ १६॥✎ 347

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #347 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् की → श्रीमधुसूदनभगवान्‌की

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