उनकी बुद्धि रजोगुणकी अधिकताके कारण कुण्ठित रहती है, हृदयमें कामनाओंका जाल फैला रहता है और इन्द्रियाँ उनके वशमें नहीं होतीं; बस, अपने घरोंमें ही आसक्त होकर वे नित्यप्रति पितरोंकी पूजामें लगे रहते हैं॥ १७॥✎ 347
रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः।
पितॄन् यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशयाः॥ १७
उनकी बुद्धि रजोगुणकी अधिकताके कारण कुण्ठित रहती है, हृदयमें कामनाओंका जाल फैला रहता है और इन्द्रियाँ उनके वशमें नहीं होतीं; बस, अपने घरोंमें ही आसक्त होकर वे नित्यप्रति पितरोंकी पूजामें लगे रहते हैं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 397) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/32/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#347 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् की → श्रीमधुसूदनभगवान्की