माताजी! पितृलोकके भोग भोग लेनेपर जब उनके पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब देवतालोग उन्हें वहाँके ऐश्वर्यसे च्युत कर देते हैं और फिर उन्हें विवश होकर तुरन्त ही इस लोकमें गिरना पड़ता है॥ २१॥
ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति।
पतन्ति विवशा देवैः सद्यो विभ्रंशितोदयाः॥ २१
माताजी! पितृलोकके भोग भोग लेनेपर जब उनके पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब देवतालोग उन्हें वहाँके ऐश्वर्यसे च्युत कर देते हैं और फिर उन्हें विवश होकर तुरन्त ही इस लोकमें गिरना पड़ता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 398) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/32/21/