देवि! निर्गुणब्रह्म-विषयक ज्ञानयोग और मेरे प्रति किया हुआ भक्तियोग—इन दोनोंका फल एक ही है। उसे ही भगवान् कहते हैं॥ ३२॥
ज्ञानयोगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः।
द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षणः॥ ३२
देवि! निर्गुणब्रह्म-विषयक ज्ञानयोग और मेरे प्रति किया हुआ भक्तियोग—इन दोनोंका फल एक ही है। उसे ही भगवान् कहते हैं॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 399) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/32/32/