श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

यथेन्द्रियैः पृथग्द्वारैरर्थो बहुगुणाश्रयः।

एको नानेयते तद्वद्भगवान् शास्त्रवर्त्मभिः॥ ३३

yathendriyaiḥ pṛthagdvārairartho bahuguṇāśrayaḥ|

eko nāneyate tadvadbhagavān śāstravartmabhiḥ|| 33

अर्थ

जिस प्रकार रूप, रस एवं गन्ध आदि अनेक गुणोंका आश्रयभूत एक ही पदार्थ भिन्‍न-भिन्‍न इन्द्रियोंद्वारा विभिन्‍नरूपसे अनुभूत होता है, वैसे ही शास्त्रके विभिन्‍न मार्गोंद्वारा एक ही भगवान्‌की अनेक प्रकारसे अनुभूति होती है॥ ३३॥✎ 348

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #348 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें