॥ श्रीहरिः ॥
जीवस्य संसृतीर्बह्वीरविद्याकर्मनिर्मिताः।
यास्वङ्ग प्रविशन्नात्मा न वेद गतिमात्मनः॥ ३८
jīvasya saṃsṛtīrbahvīravidyākarmanirmitāḥ|
yāsvaṅga praviśannātmā na veda gatimātmanaḥ|| 38
अर्थ
देवि! अविद्याजनित कर्मके कारण जीवकी अनेकों गतियाँ होती हैं; उनमें जानेपर वह अपने स्वरूपको नहीं पहचान सकता॥ ३८॥
जीवस्य संसृतीर्बह्वीरविद्याकर्मनिर्मिताः।
यास्वङ्ग प्रविशन्नात्मा न वेद गतिमात्मनः॥ ३८
देवि! अविद्याजनित कर्मके कारण जीवकी अनेकों गतियाँ होती हैं; उनमें जानेपर वह अपने स्वरूपको नहीं पहचान सकता॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 399) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/32/38/