श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.39

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

नैतत्खलायोपदिशेन्‍नाविनीताय कर्हिचित्।

न स्तब्धाय न भिन्‍नाय नैव धर्मध्वजाय च॥ ३९

naitatkhalāyopadiśennāvinītāya karhicit|

na stabdhāya na bhinnāya naiva dharmadhvajāya ca|| 39

अर्थ

मैंने तुम्हें जो ज्ञानोपदेश दिया है—उसे दुष्ट, दुर्विनीत, घमंडी, दुराचारी और धर्मध्वजी (दम्भी) पुरुषोंको नहीं सुनाना चाहिये॥ ३९॥

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