मैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! श्रीकपिल भगवान्के ये वचन सुनकर कर्दमजीकी प्रिय पत्नी माता देवहूतिके मोहका पर्दा फट गया और वे तत्त्वप्रतिपादक सांख्यशास्त्रके ज्ञानकी आधारभूमि भगवान् श्रीकपिलजीको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं॥ १॥✎ 1314
एवं निशम्य कपिलस्य वचो जनित्री
सा कर्दमस्य दयिता किल देवहूतिः।
विस्रस्तमोहपटला तमभिप्रणम्य
तुष्टाव तत्त्वविषयाङ्कितसिद्धिभूमिम्॥ १
मैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! श्रीकपिल भगवान्के ये वचन सुनकर कर्दमजीकी प्रिय पत्नी माता देवहूतिके मोहका पर्दा फट गया और वे तत्त्वप्रतिपादक सांख्यशास्त्रके ज्ञानकी आधारभूमि भगवान् श्रीकपिलजीको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.33.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 400) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/33/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1314 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): तत्त्व-प्रतिपादक → तत्त्वप्रतिपादक