श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

तमेव ध्यायती देवमपत्यं कपिलं हरिम्।

बभूवाचिरतो वत्स निःस्पृहा तादृशे गृहे॥ २२

tameva dhyāyatī devamapatyaṃ kapilaṃ harim|

babhūvācirato vatsa niḥspṛhā tādṛśe gṛhe|| 22

अर्थ

वत्स विदुर! अपने पुत्र कपिलदेवरूप भगवान् हरिका ही चिन्तन करते-करते वे कुछ ही दिनोंमें ऐसे ऐश्‍वर्यसम्पन्‍न घरसे भी उपरत हो गयीं॥ २२॥✎ 1989

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1989 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यथोचित्त → यथोचित

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