श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यत्र नारायणो देवो नरश्‍च भगवानृषिः।

मृदु तीव्रं तपो दीर्घं तेपाते लोकभावनौ॥ २२

yatra nārāyaṇo devo naraśca bhagavānṛṣiḥ|

mṛdu tīvraṃ tapo dīrghaṃ tepāte lokabhāvanau|| 22

अर्थ

विदुरजी! पहले तो उनके दर्शन पाकर मुझे आनन्द हुआ था, किन्तु अब तो मेरे हृदयको उनकी विरहव्यथा अत्यन्त पीड़ित कर रही है। अब मैं उनके प्रिय क्षेत्र बदरिकाश्रमको जा रहा हूँ, जहाँ भगवान् श्रीनारायणदेव और नर—ये दोनों ऋषि लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये दीर्घकालीन सौम्य, दूसरोंको सुख पहुँचानेवाली एवं कठिन तपस्या कर रहे हैं॥ २१-२२॥

यह अर्थ श्लोक 21–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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