श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्युद्धवादुपाकर्ण्य सुहृदां दुःसहं वधम्।

ज्ञानेनाशमयत्क्षत्ता शोकमुत्पतितं बुधः॥ २३

ityuddhavādupākarṇya suhṛdāṃ duḥsahaṃ vadham|

jñānenāśamayatkṣattā śokamutpatitaṃ budhaḥ|| 23

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार उद्धवजीके मुखसे अपने प्रिय बन्धुओंके विनाशका असह्य समाचार सुनकर परम ज्ञानी विदुरजीको जो शोक उत्पन्‍न हुआ, उसे उन्होंने ज्ञानद्वारा शान्त कर दिया॥ २३॥

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