श्रीशुकदेवजीने कहा—जिनकी इच्छा कभी व्यर्थ नहीं होती, उन श्रीहरिने ब्राह्मणोंके शापरूप कालके बहाने अपने कुलका संहार कर अपने श्रीविग्रहको त्यागते समय विचार किया॥ २९॥✎ 208
ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः।
संहृत्य स्वकुलं नूनं त्यक्ष्यन्देहमचिन्तयत्॥ २९
श्रीशुकदेवजीने कहा—जिनकी इच्छा कभी व्यर्थ नहीं होती, उन श्रीहरिने ब्राह्मणोंके शापरूप कालके बहाने अपने कुलका संहार कर अपने श्रीविग्रहको त्यागते समय विचार किया॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.4.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 252) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/4/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)