श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

मुनिर्विवक्षुर्भगवद‍्गुणानां

सखापि ते भारतमाह कृष्णः।

यस्मिन्‍नृणां ग्राम्यसुखानुवादै-

र्मतिर्गृहीता नु हरेः कथायाम्॥ १२

munirvivakṣurbhagavadguṇānāṃ

sakhāpi te bhāratamāha kṛṣṇaḥ|

yasminnṛṇāṃ grāmyasukhānuvādai-

rmatirgṛhītā nu hareḥ kathāyām|| 12

अर्थ

भगवन्! आपके सखा मुनिवर कृष्णद्वैपायनने भी भगवान्‌के गुणोंका वर्णन करनेकी इच्छासे ही महाभारत रचा है। उसमें भी विषयसुखोंका उल्लेख करते हुए मनुष्योंकी बुद्धिको भगवान्‌की कथाओंकी ओर लगानेका ही प्रयत्न किया गया है॥ १२॥✎ 209 1585 1586

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #209 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1585 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पवित्र-कीर्ति → पवित्रकीर्ति
  • #1586 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोका-लोक-पर्वतसे → लोकालोक-पर्वतसे

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