श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना

विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः।

हरेः पदानुस्मृतिनिर्वृतस्य

समस्तदुःखात्ययमाशु धत्ते॥ १३

sā śraddadhānasya vivardhamānā

viraktimanyatra karoti puṃsaḥ|

hareḥ padānusmṛtinirvṛtasya

samastaduḥkhātyayamāśu dhatte|| 13

अर्थ

यह भगवत्कथाकी रुचि श्रद्धालु पुरुषके हृदयमें जब बढ़ने लगती है, तब अन्य विषयोंसे उसे विरक्त कर देती है। वह भगवच्चरणोंके निरन्तर चिन्तनसे आनन्दमग्न हो जाता है और उस पुरुषके सभी दुःखोंका तत्काल अन्त हो जाता है॥ १३॥✎ 209 1585 1586

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #209 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1585 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पवित्र-कीर्ति → पवित्रकीर्ति
  • #1586 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोका-लोक-पर्वतसे → लोकालोक-पर्वतसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें