श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.39

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

धातर्यदस्मिन् भव ईश जीवा-

स्तापत्रयेणोपहता न शर्म।

आत्मँल्लभन्ते भगवंस्तवाङ्‌घ्रि-

च्छायां सविद्यामत आश्रयेम॥ ३९

dhātaryadasmin bhava īśa jīvā-

stāpatrayeṇopahatā na śarma|

ātmam̐llabhante bhagavaṃstavāṅghri-

cchāyāṃ savidyāmata āśrayema|| 39

अर्थ

जगत‍्कर्ता जगदीश्‍वर! इस संसारमें तापत्रयसे व्याकुल रहनेके कारण जीवोंको जरा भी शान्ति नहीं मिलती। इसलिये भगवन्! हम आपके चरणोंकी ज्ञानमयी छायाका आश्रय लेते हैं॥ ३९॥

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