जगत्कर्ता जगदीश्वर! इस संसारमें तापत्रयसे व्याकुल रहनेके कारण जीवोंको जरा भी शान्ति नहीं मिलती। इसलिये भगवन्! हम आपके चरणोंकी ज्ञानमयी छायाका आश्रय लेते हैं॥ ३९॥
धातर्यदस्मिन् भव ईश जीवा-
स्तापत्रयेणोपहता न शर्म।
आत्मँल्लभन्ते भगवंस्तवाङ्घ्रि-
च्छायां सविद्यामत आश्रयेम॥ ३९
जगत्कर्ता जगदीश्वर! इस संसारमें तापत्रयसे व्याकुल रहनेके कारण जीवोंको जरा भी शान्ति नहीं मिलती। इसलिये भगवन्! हम आपके चरणोंकी ज्ञानमयी छायाका आश्रय लेते हैं॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 257) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/39/