मुनिजन एकान्त स्थानमें रहकर आपके मुखकमलका आश्रय लेनेवाले वेदमन्त्ररूप पक्षियोंके द्वारा जिनका अनुसन्धान करते रहते हैं तथा जो सम्पूर्ण पापनाशिनी नदियोंमें श्रेष्ठ श्रीगंगाजीके उद्गमस्थान हैं, आपके उन परम पावन पादपद्मोंका हम आश्रय लेते हैं॥ ४०॥
मार्गन्ति यत्ते मुखपद्मनीडै-
श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते।
यस्याघमर्षोदसरिद्वरायाः
पदं पदं तीर्थपदः प्रपन्नाः॥ ४०
मुनिजन एकान्त स्थानमें रहकर आपके मुखकमलका आश्रय लेनेवाले वेदमन्त्ररूप पक्षियोंके द्वारा जिनका अनुसन्धान करते रहते हैं तथा जो सम्पूर्ण पापनाशिनी नदियोंमें श्रेष्ठ श्रीगंगाजीके उद्गमस्थान हैं, आपके उन परम पावन पादपद्मोंका हम आश्रय लेते हैं॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 257) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1004 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्छन्द:सुपर्णैऋर्षयो → श्छन्दःसुपर्णैऋर्ऋषयो
#1005 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्छन्द:सुपर्णैऋर्ऋषयो → श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो