श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

विश्‍वस्य जन्मस्थितिसंयमार्थे

कृतावतारस्य पदाम्बुजं ते।

व्रजेम सर्वे शरणं यदीश

स्मृतं प्रयच्छत्यभयं स्वपुंसाम्॥ ४२

viśvasya janmasthitisaṃyamārthe

kṛtāvatārasya padāmbujaṃ te|

vrajema sarve śaraṇaṃ yadīśa

smṛtaṃ prayacchatyabhayaṃ svapuṃsām|| 42

अर्थ

ईश! आप संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहारके लिये ही अवतार लेते हैं; अतः हम सब आपके उन चरणकमलोंकी शरण लेते हैं, जो अपना स्मरण करनेवाले भक्तजनोंको अभय कर देते हैं॥ ४२॥

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