॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.5.43
यत्सानुबन्धेऽसति देहगेहे
ममाहमित्यूढदुराग्रहाणाम् ।
पुंसां सुदूरं वसतोऽपि पुर्यां
भजेम तत्ते भगवन् पदाब्जम्॥ ४३
yatsānubandhe'sati dehagehe
mamāhamityūḍhadurāgrahāṇām |
puṃsāṃ sudūraṃ vasato'pi puryāṃ
bhajema tatte bhagavan padābjam|| 43
अर्थ
जिन पुरुषोंका देह, गेह तथा उनसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य तुच्छ पदार्थोंमें अहंता, ममताका दृढ़ दुराग्रह है, उनके शरीरमें (आपके अन्तर्यामीरूपसे) रहनेपर भी जो अत्यन्त दूर हैं; उन्हीं आपके चरणारविन्दोंको हम भजते हैं॥ ४३॥