श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.43

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यत्सानुबन्धेऽसति देहगेहे

ममाहमित्यूढदुराग्रहाणाम् ।

पुंसां सुदूरं वसतोऽपि पुर्यां

भजेम तत्ते भगवन् पदाब्जम्॥ ४३

yatsānubandhe'sati dehagehe

mamāhamityūḍhadurāgrahāṇām |

puṃsāṃ sudūraṃ vasato'pi puryāṃ

bhajema tatte bhagavan padābjam|| 43

अर्थ

जिन पुरुषोंका देह, गेह तथा उनसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य तुच्छ पदार्थोंमें अहंता, ममताका दृढ़ दुराग्रह है, उनके शरीरमें (आपके अन्तर्यामीरूपसे) रहनेपर भी जो अत्यन्त दूर हैं; उन्हीं आपके चरणारविन्दोंको हम भजते हैं॥ ४३॥

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