श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

निर्भिन्‍नान्यस्य चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत्।

प्राणेनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते॥ १६

nirbhinnānyasya carmāṇi lokapālo'nilo'viśat|

prāṇenāṃśena saṃsparśaṃ yenāsau pratipadyate|| 16

अर्थ

फिर उस विराट् विग्रहमें त्वचा उत्पन्‍न हुई; उसमें अपने अंश त्वगिन्द्रियके सहित वायु स्थित हुआ, जिस त्वगिन्द्रियसे जीव स्पर्शका अनुभव करता है॥ १६॥✎ 220

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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