श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

कर्णावस्य विनिर्भिन्‍नौ धिष्ण्यं स्वं विविशुर्दिशः।

श्रोत्रेणांशेन शब्दस्य सिद्धिं येन प्रपद्यते॥ १७

karṇāvasya vinirbhinnau dhiṣṇyaṃ svaṃ viviśurdiśaḥ|

śrotreṇāṃśena śabdasya siddhiṃ yena prapadyate|| 17

अर्थ

जब इसके कर्णछिद्र प्रकट हुए, तब उनमें अपने अंश श्रवणेन्द्रियके सहित दिशाओंने प्रवेश किया, जिस श्रवणेन्द्रियसे जीवको शब्दका ज्ञान होता है॥ १७॥✎ 220

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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