फिर विराट् शरीरमें चर्म उत्पन्न हुआ; उसमें अपने अंश रोमोंके सहित ओषधियाँ स्थित हुईं, जिन रोमोंसे जीव खुजली आदिका अनुभव करता है॥ १८॥✎ 220
त्वचमस्य विनिर्भिन्नां विविशुर्धिष्ण्यमोषधीः।
अंशेन रोमभिः कण्डूं यैरसौ प्रतिपद्यते॥ १८
फिर विराट् शरीरमें चर्म उत्पन्न हुआ; उसमें अपने अंश रोमोंके सहित ओषधियाँ स्थित हुईं, जिन रोमोंसे जीव खुजली आदिका अनुभव करता है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 260) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/6/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने