श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त्वचमस्य विनिर्भिन्‍नां विविशुर्धिष्ण्यमोषधीः।

अंशेन रोमभिः कण्डूं यैरसौ प्रतिपद्यते॥ १८

tvacamasya vinirbhinnāṃ viviśurdhiṣṇyamoṣadhīḥ|

aṃśena romabhiḥ kaṇḍūṃ yairasau pratipadyate|| 18

अर्थ

फिर विराट् शरीरमें चर्म उत्पन्‍न हुआ; उसमें अपने अंश रोमोंके सहित ओषधियाँ स्थित हुईं, जिन रोमोंसे जीव खुजली आदिका अनुभव करता है॥ १८॥✎ 220

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #220 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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