श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

आत्मानं चास्य निर्भिन्‍नमभिमानोऽविशत्पदम्।

कर्मणांशेन येनासौ कर्तव्यं प्रतिपद्यते॥ २५

ātmānaṃ cāsya nirbhinnamabhimāno'viśatpadam|

karmaṇāṃśena yenāsau kartavyaṃ pratipadyate|| 25

अर्थ

तत्पश्चात् विराट् पुरुषमें अहंकार उत्पन्‍न हुआ; इस अपने आश्रयमें क्रियाशक्तिसहित अभिमान (रुद्र)-ने प्रवेश किया। इससे जीव अपने कर्तव्यको स्वीकार करता है॥ २५॥

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