तत्पश्चात् विराट् पुरुषमें अहंकार उत्पन्न हुआ; इस अपने आश्रयमें क्रियाशक्तिसहित अभिमान (रुद्र)-ने प्रवेश किया। इससे जीव अपने कर्तव्यको स्वीकार करता है॥ २५॥
आत्मानं चास्य निर्भिन्नमभिमानोऽविशत्पदम्।
कर्मणांशेन येनासौ कर्तव्यं प्रतिपद्यते॥ २५
तत्पश्चात् विराट् पुरुषमें अहंकार उत्पन्न हुआ; इस अपने आश्रयमें क्रियाशक्तिसहित अभिमान (रुद्र)-ने प्रवेश किया। इससे जीव अपने कर्तव्यको स्वीकार करता है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 261) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/6/25/