जहाँ न पहुँचकर मनके सहित वाणी भी लौट आती है तथा जिनका पार पानेमें अहंकारके अभिमानी रुद्र तथा अन्य इन्द्रियाधिष्ठाता देवता भी समर्थ नहीं हैं, उन श्रीभगवान्को हम नमस्कार करते हैं॥ ४०॥✎ 222223224225
यतोऽप्राप्य न्यवर्तन्त वाचश्च मनसा सह।
अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः॥ ४०
जहाँ न पहुँचकर मनके सहित वाणी भी लौट आती है तथा जिनका पार पानेमें अहंकारके अभिमानी रुद्र तथा अन्य इन्द्रियाधिष्ठाता देवता भी समर्थ नहीं हैं, उन श्रीभगवान्को हम नमस्कार करते हैं॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 262) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/6/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को