महात्मालोग भगवत्प्राप्तिके साक्षात् मार्ग ही होते हैं, उनके यहाँ सर्वदा देवदेव श्रीहरिके गुणोंका गान होता रहता है; अल्पपुण्य पुरुषको उनकी सेवाका अवसर मिलना अत्यन्त कठिन है॥ २०॥✎ 228229230
दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु।
यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः॥ २०
महात्मालोग भगवत्प्राप्तिके साक्षात् मार्ग ही होते हैं, उनके यहाँ सर्वदा देवदेव श्रीहरिके गुणोंका गान होता रहता है; अल्पपुण्य पुरुषको उनकी सेवाका अवसर मिलना अत्यन्त कठिन है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 265) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/7/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#228 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को