श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

प्रजापतीनां स पतिश्‍चक्लृपे कान् प्रजापतीन्।

सर्गांश्चैवानुसर्गांश्‍च मनून्मन्वन्तराधिपान्॥ २५

prajāpatīnāṃ sa patiścaklṛpe kān prajāpatīn|

sargāṃścaivānusargāṃśca manūnmanvantarādhipān|| 25

अर्थ

वह विराट् ब्रह्मादि प्रजापतियोंका भी प्रभु है। उसने किन-किन प्रजापतियोंको उत्पन्‍न किया तथा सर्ग, अनुसर्ग और मन्वन्तरोंके अधिपति मनुओंकी भी किस क्रमसे रचना की?॥ २५॥✎ 231

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #231 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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