श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः।

अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम्॥ ५

deśataḥ kālato yo'sāvavasthātaḥ svato'nyataḥ|

aviluptāvabodhātmā sa yujyetājayā katham|| 5

अर्थ

जिनके ज्ञानका देश, काल अथवा अवस्थासे, अपने-आप या किसी दूसरे निमित्तसे भी कभी लोप नहीं होता, उनका मायाके साथ किस प्रकार संयोग हो सकता है॥ ५॥✎ 226

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #226 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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