॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.7.5
देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः।
अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम्॥ ५
deśataḥ kālato yo'sāvavasthātaḥ svato'nyataḥ|
aviluptāvabodhātmā sa yujyetājayā katham|| 5
अर्थ
जिनके ज्ञानका देश, काल अथवा अवस्थासे, अपने-आप या किसी दूसरे निमित्तसे भी कभी लोप नहीं होता, उनका मायाके साथ किस प्रकार संयोग हो सकता है॥ ५॥✎ 226