एकमात्र ये भगवान् ही समस्त क्षेत्रोंमें उनके साक्षीरूपसे स्थित हैं, फिर इन्हें दुर्भाग्य या किसी प्रकारके कर्मजनित क्लेशकी प्राप्ति कैसे हो सकती है॥ ६॥✎ 226
भगवानेक एवैष सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः।
अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभिः कुतः॥ ६
एकमात्र ये भगवान् ही समस्त क्षेत्रोंमें उनके साक्षीरूपसे स्थित हैं, फिर इन्हें दुर्भाग्य या किसी प्रकारके कर्मजनित क्लेशकी प्राप्ति कैसे हो सकती है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 263) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/7/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)