इस प्रकार अपनी स्वरूपभूता चिच्छक्तिके साथ एक सहस्र चतुर्युगपर्यन्त जलमें शयन करनेके अनन्तर जब उन्हींके द्वारा नियुक्त उनकी कालशक्तिने उन्हें जीवोंके कर्मोंकी प्रवृत्तिके लिये प्रेरित किया, तब उन्होंने अपने शरीरमें लीन हुए अनन्त लोक देखे॥ १२॥✎ 235236
चतुर्युगानां च सहस्रमप्सु
स्वपन् स्वयोदीरितया स्वशक्त्या।
कालाख्ययाऽऽसादितकर्मतन्त्रो
लोकानपीतान्ददृशे स्वदेहे॥ १२
इस प्रकार अपनी स्वरूपभूता चिच्छक्तिके साथ एक सहस्र चतुर्युगपर्यन्त जलमें शयन करनेके अनन्तर जब उन्हींके द्वारा नियुक्त उनकी कालशक्तिने उन्हें जीवोंके कर्मोंकी प्रवृत्तिके लिये प्रेरित किया, तब उन्होंने अपने शरीरमें लीन हुए अनन्त लोक देखे॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.8.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 269) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/8/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#235 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्की