श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तस्यार्थसूक्ष्माभिनिविष्टदृष्टे-

रन्तर्गतोऽर्थो रजसा तनीयान्।

गुणेन कालानुगतेन विद्धः

सूष्यंस्तदाभिद्यत नाभिदेशात्॥ १३

tasyārthasūkṣmābhiniviṣṭadṛṣṭe-

rantargato'rtho rajasā tanīyān|

guṇena kālānugatena viddhaḥ

sūṣyaṃstadābhidyata nābhideśāt|| 13

अर्थ

जिस समय भगवान्‌की दृष्टि अपनेमें निहित लिंगशरीरादि सूक्ष्मतत्त्वपर पड़ी, तब वह कालाश्रित रजोगुणसे क्षुभित होकर सृष्टिरचनाके निमित्त उनके नाभिदेशसे बाहर निकला॥ १३॥✎ 235 236

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #235 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्‌की
  • #236 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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