श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तस्यां स चाम्भोरुहकर्णिकाया-

मवस्थितो लोकमपश्यमानः।

परिक्रमन् व्योम्नि विवृत्तनेत्र-

श्‍चत्वारि लेभेऽनुदिशं मुखानि॥ १६

tasyāṃ sa cāmbhoruhakarṇikāyā-

mavasthito lokamapaśyamānaḥ|

parikraman vyomni vivṛttanetra-

ścatvāri lebhe'nudiśaṃ mukhāni|| 16

अर्थ

उस कमलकी कर्णिका (गद्दी)-में बैठे हुए ब्रह्माजीको जब कोई लोक दिखायी नहीं दिया, तब वे आँखें फाड़कर आकाशमें चारों ओर गर्दन घुमाकर देखने लगे, इससे उनके चारों दिशाओंमें चार मुख हो गये॥ १६॥✎ 235 236

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #235 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्‌की
  • #236 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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