उस कमलकी कर्णिका (गद्दी)-में बैठे हुए ब्रह्माजीको जब कोई लोक दिखायी नहीं दिया, तब वे आँखें फाड़कर आकाशमें चारों ओर गर्दन घुमाकर देखने लगे, इससे उनके चारों दिशाओंमें चार मुख हो गये॥ १६॥✎ 235236
तस्यां स चाम्भोरुहकर्णिकाया-
मवस्थितो लोकमपश्यमानः।
परिक्रमन् व्योम्नि विवृत्तनेत्र-
श्चत्वारि लेभेऽनुदिशं मुखानि॥ १६
उस कमलकी कर्णिका (गद्दी)-में बैठे हुए ब्रह्माजीको जब कोई लोक दिखायी नहीं दिया, तब वे आँखें फाड़कर आकाशमें चारों ओर गर्दन घुमाकर देखने लगे, इससे उनके चारों दिशाओंमें चार मुख हो गये॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.8.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 269) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/8/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#235 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्की