॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.8.30
चराचरौको भगवन्महीध्र-
महीन्द्रबन्धुं सलिलोपगूढम्।
किरीटसाहस्रहिरण्यशृङ्ग-
माविर्भवत्कौस्तुभरत्नगर्भम् ॥ ३०
carācarauko bhagavanmahīdhra-
mahīndrabandhuṃ salilopagūḍham|
kirīṭasāhasrahiraṇyaśṛṅga-
māvirbhavatkaustubharatnagarbham || 30
अर्थ
वे नागराज अनन्तके बन्धु श्रीनारायण ऐसे जान पड़ते हैं, मानो कोई जलसे घिरे हुए पर्वतराज ही हों। पर्वतपर जैसे अनेकों जीव रहते हैं, उसी प्रकार वे सम्पूर्ण चराचरके आश्रय हैं; शेषजीके फणोंपर जो सहस्रों मुकुट हैं वे ही मानो उस पर्वतके सुवर्णमण्डित शिखर हैं तथा वक्षःस्थलमें विराजमान कौस्तुभमणि उसके गर्भसे प्रकट हुआ रत्न है॥ ३०॥