श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

निवीतमाम्नायमधुव्रतश्रिया

स्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम्।

सूर्येन्दुवाय्वग्न्यगमं त्रिधामभिः

परिक्रमत्प्राधनिकैर्दुरासदम् ॥ ३१

nivītamāmnāyamadhuvrataśriyā

svakīrtimayyā vanamālayā harim|

sūryenduvāyvagnyagamaṃ tridhāmabhiḥ

parikramatprādhanikairdurāsadam || 31

अर्थ

प्रभुके गलेमें वेदरूप भौंरोंसे गुंजायमान अपनी कीर्तिमयी वनमाला विराज रही है; सूर्य, चन्द्र, वायु और अग्‍नि आदि देवताओंकी भी आपतक पहुँच नहीं है तथा त्रिभुवनमें बेरोक-टोक विचरण करनेवाले सुदर्शनचक्रादि आयुध भी प्रभुके आस-पास ही घूमते रहते हैं, उनके लिये भी आप अत्यन्त दुर्लभ हैं॥ ३१॥

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