श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स कर्मबीजं रजसोपरक्तः

प्रजाः सिसृक्षन्‍नियदेव दृष्ट्वा।

अस्तौद्विसर्गाभिमुखस्तमीड्य-

मव्यक्तवर्त्मन्यभिवेशितात्मा ॥ ३३

sa karmabījaṃ rajasoparaktaḥ

prajāḥ sisṛkṣanniyadeva dṛṣṭvā|

astaudvisargābhimukhastamīḍya-

mavyaktavartmanyabhiveśitātmā || 33

अर्थ

रजोगुणसे व्याप्त ब्रह्माजी प्रजाकी रचना करना चाहते थे। जब उन्होंने सृष्टिके कारणरूप केवल ये पाँच ही पदार्थ देखे, तब लोकरचनाके लिये उत्सुक होनेके कारण वे अचिन्त्यगति श्रीहरिमें चित्त लगाकर उन परमपूजनीय प्रभुकी स्तुति करने लगे॥ ३३॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धेऽष्टमोऽध्यायः॥ ८॥

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