श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स्वर्धुन्युदार्द्रैः स्वजटाकलापै-

रुपस्पृशन्तश्‍चरणोपधानम् ।

पद्मं यदर्चन्त्यहिराजकन्याः

सप्रेमनानाबलिभिर्वरार्थाः ॥ ५

svardhunyudārdraiḥ svajaṭākalāpai-

rupaspṛśantaścaraṇopadhānam |

padmaṃ yadarcantyahirājakanyāḥ

sapremanānābalibhirvarārthāḥ || 5

अर्थ

सनत्कुमार आदि ऋषियोंने मन्दाकिनीके जलसे भीगे अपने जटासमूहसे उनके चरणोंकी चौकीके रूपमें स्थित कमलका स्पर्श किया, जिसकी नागराजकुमारियाँ अभिलषित वरकी प्राप्तिके लिये प्रेमपूर्वक अनेकों उपहार-सामग्रियोंसे पूजा करती हैं॥ ५॥

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