श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

मुहुर्गृणन्तो वचसानुराग-

स्खलत्पदेनास्य कृतानि तज्ज्ञाः।

किरीटसाहस्रमणिप्रवेक-

प्रद्योतितोद्दामफणासहस्रम् ॥ ६

muhurgṛṇanto vacasānurāga-

skhalatpadenāsya kṛtāni tajjñāḥ|

kirīṭasāhasramaṇipraveka-

pradyotitoddāmaphaṇāsahasram || 6

अर्थ

सनत्कुमारादि उनकी लीलाके मर्मज्ञ हैं। उन्होंने बार-बार प्रेम-गद्गद वाणीसे उनकी लीलाका गान किया। उस समय शेषभगवान्‌के उठे हुए सहस्रों फण किरीटोंकी सहस्र-सहस्र श्रेष्ठ मणियोंकी छिटकती हुई रश्मियोंसे जगमगा रहे थे॥ ६॥ भगवान् संकर्षणने निवृत्तिपरायण सनत्कुमारजीको यह भागवत सुनाया था—ऐसा प्रसिद्ध है। सनत्कुमारजीने फिर इसे परम व्रतशील सांख्यायन मुनिको, उनके प्रश्न करनेपर सुनाया॥ ७॥ परमहंसोंमें प्रधान श्रीसांख्यायनजीको जब भगवान्‌की विभूतियोंका वर्णन करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने इसे अपने अनुगत शिष्य, हमारे गुरु श्रीपराशरजीको और बृहस्पतिजीको सुनाया॥ ८॥ इसके पश्चात् परम दयालु पराशरजीने पुलस्त्य मुनिके कहनेसे वह आदिपुराण मुझसे कहा। वत्स! श्रद्धालु और सदा अनुगत देखकर अब वही पुराण मैं तुम्हें सुनाता हूँ॥ ९॥ ✎ 233

यह व्याख्या श्लोक 3.8.6 से 3.8.9 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #233 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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