श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

योऽविद्ययानुपहतोऽपि दशार्धवृत्त्या

निद्रामुवाह जठरीकृतलोकयात्रः।

अन्तर्जलेऽहिकशिपुस्पर्शानुकूलां

भीमोर्मिमालिनि जनस्य सुखं विवृण्वन्॥ २०

yo'vidyayānupahato'pi daśārdhavṛttyā

nidrāmuvāha jaṭharīkṛtalokayātraḥ|

antarjale'hikaśipusparśānukūlāṃ

bhīmormimālini janasya sukhaṃ vivṛṇvan|| 20

अर्थ

प्रभो! आप अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—पाँचोंमेंसे किसीके भी अधीन नहीं हैं; तथापि इस समय जो सारे संसारको अपने उदरमें लीनकर भयंकर तरंगमालाओंसे विक्षुब्ध प्रलयकालीन जलमें अनन्तविग्रहकी कोमल शय्यापर शयन कर रहे हैं, वह पूर्वकल्पकी कर्मपरम्परासे श्रमित हुए जीवोंको विश्राम देनेके लिये ही है॥ २०॥✎ 238

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #238 शब्दोंके बीचका स्थान: पुरुषोत्तमभगवान् को → पुरुषोत्तमभगवान्‌को

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