श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार तप, विद्या और समाधिके द्वारा अपने उत्पत्तिस्थान श्रीभगवान्को देखकर तथा अपने मन और वाणीकी शक्तिके अनुसार उनकी स्तुति कर ब्रह्माजी थके-से होकर मौन हो गये॥ २६॥✎ 239240
स्वसम्भवं निशाम्यैवं तपोविद्यासमाधिभिः।
यावन्मनोवचः स्तुत्वा विरराम स खिन्नवत्॥ २६
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार तप, विद्या और समाधिके द्वारा अपने उत्पत्तिस्थान श्रीभगवान्को देखकर तथा अपने मन और वाणीकी शक्तिके अनुसार उनकी स्तुति कर ब्रह्माजी थके-से होकर मौन हो गये॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.9.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 276) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/9/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#239 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् ने → श्रीमधुसूदनभगवान्ने
#240 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को