श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अथाभिप्रेतमन्वीक्ष्य ब्रह्मणो मधुसूदनः।

विषण्णचेतसं तेन कल्पव्यतिकराम्भसा॥ २७

athābhipretamanvīkṣya brahmaṇo madhusūdanaḥ|

viṣaṇṇacetasaṃ tena kalpavyatikarāmbhasā|| 27

अर्थ

श्रीमधुसूदनभगवान्‌ने देखा कि ब्रह्माजी इस प्रलयजलराशिसे बहुत घबराये हुए हैं तथा लोकरचनाके विषयमें कोई निश्चित विचार न होनेके कारण उनका चित्त बहुत खिन्‍न है। तब उनके अभिप्रायको जानकर वे अपनी गम्भीर वाणीसे उनका खेद शान्त करते हुए कहने लगे ॥ २७-२८॥✎ 239 240

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #239 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् ने → श्रीमधुसूदनभगवान्‌ने
  • #240 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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