श्रीमधुसूदनभगवान्ने देखा कि ब्रह्माजी इस प्रलयजलराशिसे बहुत घबराये हुए हैं तथा लोकरचनाके विषयमें कोई निश्चित विचार न होनेके कारण उनका चित्त बहुत खिन्न है। तब उनके अभिप्रायको जानकर वे अपनी गम्भीर वाणीसे उनका खेद शान्त करते हुए कहने लगे ॥ २७-२८॥✎ 239240
यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः।
तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव॥ २८
श्रीमधुसूदनभगवान्ने देखा कि ब्रह्माजी इस प्रलयजलराशिसे बहुत घबराये हुए हैं तथा लोकरचनाके विषयमें कोई निश्चित विचार न होनेके कारण उनका चित्त बहुत खिन्न है। तब उनके अभिप्रायको जानकर वे अपनी गम्भीर वाणीसे उनका खेद शान्त करते हुए कहने लगे ॥ २७-२८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.9.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 276) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/9/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#239 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीमधुसूदनभगवान् ने → श्रीमधुसूदनभगवान्ने
#240 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को