श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.43

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

सर्ववेदमयेनेदमात्मनाऽऽत्माऽऽत्मयोनिना।

प्रजाः सृज यथापूर्वं याश्‍च मय्यनुशेरते॥ ४३

sarvavedamayenedamātmanā''tmā''tmayoninā|

prajāḥ sṛja yathāpūrvaṃ yāśca mayyanuśerate|| 43

अर्थ

ब्रह्माजी! त्रिलोकीको तथा जो प्रजा इस समय मुझमें लीन है, उसे तुम पूर्वकल्पके समान मुझसे उत्पन्‍न हुए अपने सर्ववेदमय स्वरूपसे स्वयं ही रचो॥ ४३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें