श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

पूर्णिमासूत विरजं विश्‍वगं च परंतप।

देवकुल्यां हरेः पादशौचाद्याभूत्सरिद्दिवः॥ १४

pūrṇimāsūta virajaṃ viśvagaṃ ca paraṃtapa|

devakulyāṃ hareḥ pādaśaucādyābhūtsariddivaḥ|| 14

अर्थ

शत्रुतापन विदुरजी! पूर्णिमाके विरज और विश्‍वग नामके दो पुत्र तथा देवकुल्या नामकी एक कन्या हुई। यही दूसरे जन्ममें श्रीहरिके चरणोंके धोवनसे देवनदी गंगाके रूपमें प्रकट हुई॥ १४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें