श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

प्रजापतिः स भगवान् रुचिस्तस्यामजीजनत्।

मिथुनं ब्रह्मवर्चस्वी परमेण समाधिना॥ ३

prajāpatiḥ sa bhagavān rucistasyāmajījanat|

mithunaṃ brahmavarcasvī parameṇa samādhinā|| 3

अर्थ

प्रजापति रुचि भगवान्‌के अनन्य चिन्तनके कारण ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न थे। उन्होंने आकूतिके गर्भसे एक पुरुष और स्त्रीका जोड़ा उत्पन्‍न किया॥ ३॥ उनमें जो पुरुष था, वह साक्षात् यज्ञस्वरूपधारी भगवान् विष्णु थे और जो स्त्री थी, वह भगवान्‌से कभी अलग न रहनेवाली लक्ष्मीजीकी अंशस्वरूपा ‘दक्षिणा’ थी॥ ४॥ मनुजी अपनी पुत्री आकूतिके उस परमतेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्‍नतासे अपने घर ले आये और दक्षिणाको रुचि प्रजापतिने अपने पास रखा॥ ५॥ जब दक्षिणा विवाहके योग्य हुई तो उसने यज्ञभगवान्‌को ही पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की, तब भगवान् यज्ञपुरुषने उससे विवाह किया। इससे दक्षिणाको बड़ा सन्तोष हुआ। भगवान्‌ने प्रसन्‍न होकर उससे बारह पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ६॥ उनके नाम हैं—तोष, प्रतोष, सन्तोष, भद्र, शान्ति, इडस्पति, इध्म, कवि, विभु, स्वह्न, सुदेव और रोचन॥ ७॥ ✎ 353 354 355

यह व्याख्या श्लोक 4.1.3 से 4.1.7 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #353 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #354 शब्दोंके बीचका स्थान: यज्ञभगवान् को → यज्ञभगवान्‌को
  • #355 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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