मनुजी अपनी पुत्री आकूतिके उस परमतेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्नतासे अपने घर ले आये और दक्षिणाको रुचि प्रजापतिने अपने पास रखा॥ ५॥✎ 353354355
आनिन्ये स्वगृहं पुत्र्याः पुत्रं विततरोचिषम्।
स्वायम्भुवो मुदा युक्तो रुचिर्जग्राह दक्षिणाम्॥ ५
मनुजी अपनी पुत्री आकूतिके उस परमतेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्नतासे अपने घर ले आये और दक्षिणाको रुचि प्रजापतिने अपने पास रखा॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 405) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)