॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.1.57
सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान्
सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः।
दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन
यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम्॥ ५७
so'yaṃ sthitivyatikaropaśamāya sṛṣṭān
sattvena naḥ suragaṇānanumeyatattvaḥ|
dṛśyādadabhrakaruṇena vilokanena
yacchrīniketamamalaṃ kṣipatāravindam|| 57
अर्थ
जिनके तत्त्वका शास्त्रके आधारपर हमलोग केवल अनुमान ही करते हैं, प्रत्यक्ष नहीं कर पाते—उन्हीं भगवान्ने देवताओंको संसारकी मर्यादामें किसी प्रकारकी गड़बड़ी न हो, इसीलिये सत्त्वगुणसे उत्पन्न किया है। अब वे अपने करुणामय नेत्रोंसे—जो समस्त शोभा और सौन्दर्यके निवासस्थान निर्मल दिव्य कमलको भी नीचा दिखानेवाले हैं—हमारी ओर निहारें॥ ५७॥✎ 357