श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.65

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

भवस्य पत्‍नी तु सती भवं देवमनुव्रता।

आत्मनः सदृशं पुत्रं न लेभे गुणशीलतः॥ ६५

bhavasya patnī tu satī bhavaṃ devamanuvratā|

ātmanaḥ sadṛśaṃ putraṃ na lebhe guṇaśīlataḥ|| 65

अर्थ

महादेवजीकी पत्‍नी सती थीं, वे सब प्रकारसे अपने पतिदेवकी सेवामें संलग्न रहनेवाली थीं। किन्तु उनके अपने गुण और शीलके अनुरूप कोई पुत्र नहीं हुआ॥ ६५॥

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