श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

नायं मार्गो हि साधूनां हृषीकेशानुवर्तिनाम्।

यदात्मानं पराग्गृह्य पशुवद‍्भूतवैशसम्॥ १०

nāyaṃ mārgo hi sādhūnāṃ hṛṣīkeśānuvartinām|

yadātmānaṃ parāggṛhya paśuvadbhūtavaiśasam|| 10

अर्थ

इस जड शरीरको ही आत्मा मानकर इसके लिये पशुओंकी भाँति प्राणियोंकी
हिंसा करना यह भगवत्सेवी साधुजनोंका मार्ग नहीं है॥ १०॥

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